जर्मनी और मुसलमान
जर्मनी में रहनेवाले मुसलमानों को जर्मन भाषा सीखनी चाहिये, मुस्लिम समुदाय के बच्चों को इस्लाम की धार्मिक शिक्षा भी जर्मनी में दी जाए और जर्मन विश्वविद्यालयों में मौलवी बनने के लिये प्रशिक्षण कोर्स शुरू किये जाएं. इसके अलावा मस्जिद बनाने की अनुमति के नियमों को आसान बनाया जाए और मुस्लिम समुदाय के बच्चों को नौकरी और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें.
कुछ इस तरह के प्रस्ताव और सिफारिशों के साथ जर्मनी अपने यहां बढ़ती मुस्लिम आबादी को समायोजित करने की कोशिश कर रहा है.जर्मनी की राजधानी बर्लिन में जर्मन इस्लामिक कांफ्रेंस के दौरान जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी में मुसलमानों की संख्या तय अनुमान से 10 लाख ज़्यादा हो गई है.शरणार्थी और आव्रजन के संघीय ब्यूरो की इस रिपोर्ट के मुताबिक पहले यहां करीब 30 लाख मुसलमान थे जो अब बढ़कर 40 लाख हो गये हैं यानी कि कुल आबादी का पाँच प्रतिशत.
मुसलमानों की संख्या और उनकी सामाजिक दशा पर जर्मनी में ये पहली आधिकारिक रिपोर्ट मानी जा रही है.
भिन्न संस्कृति रिपोर्ट के मुताबिक 40 लाख मुसलमानों में से करीब 65 प्रतिशत मुसलमान टर्किश मूल के हैं और शेष दक्षिण पूर्वी यूरोप के देशों, अफ़्रीका और कुछ अफ़ग़ान मूल के हैं. पश्चिमी समाज में मुसलमानों का समन्वय तभी सफल हो सकता है जब वो बिना शर्त लोकतांत्रिक मूल्यों को स्वीकारें गृह मंत्री वोल्फगांग शॉय्बले सांस्कृतिक तौर पर भिन्न इस आबादी का सामाजिक और धार्मिक रूप से जर्मन समाज के साथ मेल-जोल बने, सरकार के सामने ये एक बड़ी चुनौती है. इस चुनौती की चिंता जर्मनी के गृह मंत्री वोल्फगांग शॉय्बले के इस बयान में देखी जा सकती है जो उन्होंने काहिरा विश्वविद्यालय में अपने भाषण के दौरान दिया. उन्होंने कहा, "पश्चिमी समाज में मुसलमानों का समन्वय तभी सफल हो सकता है जब वो बिना शर्त लोकतांत्रिक मूल्यों को स्वीकारें."
शॉयब्ले के इस बयान को फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी के उस ऐतिहासिक भाषण से भी जोड़कर देखा जा रहा है जिसमें उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने पर सवाल उठाए हैं. समन्वय का सवाल तब संवेदनशील हो जाता है जब मुस्लिम महिलाओं के हेडस्कार्फ़ पहनने, मुस्लिम बच्चियों के जर्मन स्कूलों में तैराकी और यौन शिक्षा से कथित परहेज, रमजान के महीने में परीक्षा और जर्मन स्कूलों में कथित भेदभाव और उससे असंतोष, मस्जिद निर्माण की अनुमति और मस्जिदों के कामकाज की पद्धति और अंतिम संस्कार जैसे मुद्दे उठते हैं जिनसे शेष जर्मन समाज की आए दिन टकराहट होती है.
आदर्श स्थित हालांकि इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर कोई बोलना नहीं चाहता. जर्मनी के फ़्रायबुर्ग शहर के एक रेस्त्रां में काम करनेवाले 22 साल के सुलेमान फ़र्राटे से जर्मन बोलते हैं, "मैं बचपन में ही यहां आ गया था और मेरे लिये यही मेरा देश है." बांग्लादेश से जर्मनी आकर बसे काजी मोहम्मद तुफैल मानते हैं, "एक संदेह हमेशा हमारा पीछा करता रहता है लेकिन हम भी अपने ही घेट्टो में रहते हैं."एक स्थानीय पत्रकार कहते हैं, "ये एक आदर्श स्थिति होगी कि मुसलमान यहां मुख्यधारा में शामिल हो पाएं वरना जर्मन और मुस्लिम समाज की बुनियाद में ही फ़र्क है."
मुस्लिम समुदाय के खुद अपने भी अंतर्विरोध हैं जहां प्रगतिशील तबका जर्मन कानूनी व्यवस्था और खुलेपन का समर्थक है वहीं रूढ़िवादि लोगों की अपनी शिकायतें औऱ वर्जनाएं हैं. सूत्रों के अनुसार ऐसे ही एक संगठन ने बर्लिन के इस्लामिक सम्मेलन में उस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया जिसमें मुसलमान संगठनो से अपनी फंडिंग व्यवस्था को सार्वजनिक करने के लिये कहा गया था.
Friday, October 16, 2009
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आज बस राम-राम। दोस्त को भी और उनको भी जो मुझे अपना दुश्मन समझतें हैं या वो मेरे दुश्मन है। राम राम अपनों को भी,परायों को भी। अच्छे को भी, बुरे को भी।
ReplyDeleteइस धरा पर रहने वाले सभी जीवों को, जड़ को, चेतन को, अवचेतन को दिवाली की राम-राम।
aalekh ke liye badhayee, deepawali ki shubh kamanayen,
ReplyDeleteदीपावली की हार्दिक शुभकामनायें
ReplyDeleteबहुत ही काबिलेतारीफ बेहतरीन
SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com